Friday, August 27, 2010

कुछ सुलझे जवाब जो जलते रहे..धीरे धीरे..

सुलझे मन का क्या दू वर्णन..
सुलझन; व्यापित उलझन है !!


क्या दे पता वो मन जिसमे..
जिसमे उधड़ा हर छोर अगम है !!


जो बिम्ब लगे तुमको कोमल..
वो विधु का रूप विषम है..
श्रापित किरणों से झुलसी..
कोई तममय विरहन है..
क्या शीतलता देती तन को..
जब उसमे लगी अगन है !!

मदिरा ही दे पाए वो तुमको..
जिनका पीयूष धोतम है !! 


तुम आकुल हो जिन प्रश्नों के..
ये कुछ उनके उत्तर है !!

मन के कोनो से ही उठता..
कोई कल्पित संगम है !!

कैसे वो करे तृप्त जीवन जो आतृप्त स्वयं है..!!

2 comments:

  1. ye jawaab hai picchle sawaal ka..par ye maine nahi likha hai..kai saal pehle kisi ne likha tha mere sawaal pe..

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  2. हर उलझन को एक प्यास है
    सुलझ पाउ कैसे ;
    विम्बो के धोखो से
    निकल पाउ कैसे ;
    पर सोचो हर उलझन सुलझ जाएगी तो
    होगी नहीं प्यास और
    लेखनी में भरे हुए सागर का होगा क्या?
    ...............................

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